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कितनी अराजक है ‘आप’ की नीति ? जागरण जंक्शन फोरम

Posted On: 27 Jan, 2014 Junction Forum में

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सबसे पहले अराजकता से पहले हमें राज की अवधरणा कि बात करनी होगी | हम मानव विकास के क्रम में अपना अपना भोजन और रहने के लिए एक दूसरे को मारते और मिटाते खुद को बचाते, धीरे धीरे एक सभ्यता में बदले | राज क्या है, यह है एक ऐसी सम्लित व्यवस्था जिसमें जनता और समाज को तंत्र दिया जाता है कि सब एक दूसरे के साथ रहते हुए यह महसूस करें कि सबके अधिकार एक से हैं |
ऐसा जमीन का बटवारा हो कि मालिक कायदे कानून से अपने भवन में आराम से रहे| | यहाँ इस सरंचना को बना रहना है तो इसकी रखवाली राज करता है | राज का काम है कि लोग महफूज़ रहें और इस सब की व्यवस्था के स्तम्भ है न्याय व् विधायिका |
आज हम, एक ऐसे तंत्र का न चाहते भी, हिस्सा बने हुए हैं जहाँ ,आर टी ओ के कार्यालय में बिना रिश्वत दिए न तो ड्राइविंग लाइसेंसे मिलता है न कोई गाड़ी का नंबर | सड़क पर ऑटो वाला रोज़ पुलिस कि जेब गर्म करता है | मकान का नक्शा पास करना हो तो रिश्वत दो | जन्म हो या मृत्यु प्रमाण पत्र बिना सुविधा शुल्क के नहीं मिलेगा | वैश्य वृत्ति और ड्रग्स का कारोबार खुद पुलिस करवायगी | ऐसे चिन्हित इलाके देश की राजधानी में हों जहां विदेशी लड़कियां तस्करी कर के देह व्यापार पुलिस के संरक्षण हो रहा हो | तो राज कहाँ है | यदि राज नहीं है तो यह अराजकता है |
बदलाव को हमेशा ही अराजकता कहा जायेगा | यह शब्द शाशकों को तब याद आता जब उनको गद्दी को उतारने जनता उठ खड़ी होती है |
सड़क पर सोता दिल्ली का मुखिया अपने आप में कोई बड़ी चीज़ नहीं है | पर जनता जिस बदलाव के लिए उठ खड़ी हुई उसका जिन्दा बने रहना जरुरी है | कोई भी बदलाव अपने में कष्टकारी होता है | अपनी स्वाधीनता को पुनः छद्म लोकतान्त्रिक व्यवस्था से निकालने की जिम्मेवारी खुद आम आदमी को निकालनी होंगी | शब्दों के जाल में फंसे इस लोकतंत्र को बचाना ही होगा | लोकतंत्र में राजनीती के जरिये करोङो का सामंतवाद स्थापित करने कि व्यवस्था बदलनी होगी |



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8 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

deepakbijnory के द्वारा
January 29, 2014

100% sahmat hoo apse aadarniya raj ji

    raj के द्वारा
    January 29, 2014

    Dhanyavad bijnory ji

jlsingh के द्वारा
January 28, 2014

कोई भी बदलाव अपने में कष्टकारी होता है | अपनी स्वाधीनता को पुनः छद्म लोकतान्त्रिक व्यवस्था से निकलने कि जिम्मेवारी खुद आम आदमी को निकालने होंगे | शब्दों के जाल में फंसे इस लोकतंत्र को बचाना ही होगा | लोकतंत्र में राजनीती के जरिये करोङो का सामंतवाद स्थापित करने कि व्यवस्था बदलनी होगी |—-सही बात!

    RaJ के द्वारा
    January 28, 2014

    सिंह साहब बहुत बहुत धन्यवाद

January 27, 2014

पर व्यवस्था बदलने के लिए ये तो कोई तरीका नहीं कि स्वयं अव्यवस्था पैदा कर दी जाये और फिर उसके लिए सरकार को जिम्मेदार ठहराया जाये.

    nishamittal के द्वारा
    January 28, 2014

    नमस्कार ,आपको बहुत दिन बाद जागरण पर देखना सुखद लगा परन्तु व्यवस्था बनाने के लिए अव्यवस्था उत्पन्न करना ही मार्ग नहीं होता

    RaJ के द्वारा
    January 28, 2014

    वर्त्तमान में सरकारे लगभग अंग्रेजों के हुकूमत करने के ढर्रे पर चलने लगी है | जैसे काले गोरों का फर्क था अब शाषकों और जनता में फर्क है | सारी सड़कें जैसे इनकी ही हों जब चाहें लाल बत्ती कि दम पर ट्राफिक बंद कराकर दनादन अपने सैकड़ों वाहनों के साथ निकल जाये तो क्या यह अराजकता नहीं है | क्या अगली बार जब आर टी ओ कार्यालय में बार बार जाने पर जब बिना रिश्वत के कुछ काम न हो और आप अपना आपा खो दें चीखे चिल्लाये लोग इकठा हो जाये , एक ऑफिस जो व्यवथा बनाकर रिश्वत खोरी कर रहा हो वहाँ आप इसके खिलाफ अव्यवस्था फैला दें | बहुत सम्भव है कि कई लोग इसे अराजकता कहेंगे और खुद यह कहेंगे कि पञ्च सौ सात सौ रूपये रिश्वत देकर झंझट से बच जाएँ अव्यवस्था न हो | शालिनी जी आप अधिवक्ता हैं इन राज़ रोज़ के भृष्टाचार के शिष्टाचार मुझसे ज्यादा अच्छा जानती होंगी बहुत धन्यवाद

    RaJ के द्वारा
    January 28, 2014

    धन्यवाद निशा जी लेख पर टिपण्णी देने के लिए और यह याद दिलाने के लिए कि वक़त हो गया इस फोरम पर आये |


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