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अरविन्द निकाल दे इस कीड़े को

Posted On: 2 Aug, 2012 Others में

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Kejariwal

तेरा वैभव अमर रहे माँ हम दिन चार रहे न रहें ….”
अरविन्द रैली से बोल कर गाड़ी में बैठते ही खाने को कुछ माँगा करता था ! मेरे मज़ाक उड़ने पर उस का कहना था कि शुगर के कारण जल्दी ही कुछ न खा सकूँ तो घबराहट होने लगती है ! आज पाँच दिन हो गए ! कल माँ ने उस के माथे पर हाथ फिराया तो मुझे उस की वो भूख याद आ गयी !

आज पुणे में एक साथ कई जगह कम ताकत के बम्बों का बिस्फोट हा गया | इसमें किसी भी बम में ऐसी कोई ताकत ही नहीं थी कि एक भी आदमी हता हत  हो सकता हो | हाँ इस बम में इतना असर जरुर था कि जंतर मंतर के अनशन का नामों निशा भी बुद्धू बक्से से गायब होगया | यह हथकंडा तो बहुत छोटा है हमारा पडोसी देश तो अपनी जनता का ध्यान जमीनी हकीक़त से हटाने के लिए सीमा पर गोलाबारी शुरू करवा देता था | शायद उन्ही तरकीबों से आन्दोलन दबाने का प्रयास अब हमारे भ्रष्ट नेता कर रहे हैं | जब मीडिया का सीधा काम पैसा कमाना ही हो तो सरकार के भ्रष्ट मंत्रिओं से ज्यादा पैसा कोन दे पायेगा | मीडिया कब किस चीज़ को कितना महत्व दे यह उस तमाशे पर ज्यादा निर्भर रहता है जो आम जनता का मनोरंजन कर पाए | मीडिया को पहले भी किसी मुद्दे से कोई लेना देना नहीं था पर अन्ना एक नए प्रकार मनोरंजन उस बार उन्हें दे पाए और पूरा मीडिया उनसे जा चिपका | इंसानी जज्बे में आजादी कि लड़ाई से गुज़रे इन सालों में धरती आसमान के अंतर जैसा आ गया है| उस समय गाँधी आत्मनिर्भरता और देशभक्ति का प्रवाह लोगों के मन में भर पाए || लोग अपने तात्कालिक लालचों को दर किनार कर अपनी छोटी सोचों से ऊपर आकर पहली बार देश के लिए सोच पाए |

पता नहीं कौनसा कीड़ा अरविन्द केजरीवाल के दिमाग को कटा करता है | अपनी इनकम टैक्स के ऊँचे ओहदे कें साथ अपने घर वालों कि वही सारी इच्छाएं पूरी करता, जैसा मेंरे जैसे सभी करते हैं | चाय पीते हुए रोज़ सुबह व्यवस्था को कोसता और फिर दिन भर उसी व्यवस्था का अंग बन जाता | ज्यादा टेंसन होता तो कुछ ध्यान लगा लेता रेलक्स हो जाता | क्यों नहीं उसी सिस्टम का हिस्सा बन गया जहाँ ऐशो आराम देश विदेश में रखा पैसा सब कुछ होता | एक नहीं कई सुविधजानक वाहन व् समुन्द्र कि तरफ मुहं करे विला होती| अपने पिता कि आँख का तारा व् पत्नी व् बच्चों को वह सब देने वाला जिसके वह अधिकारी हैं , देने वाला तू ही होता |


अरविन्द तेरे दिमाग में तो कीड़ा है पर तेरे घर वालों के दिमाग में नहीं है, वे दुनिया के सारे लोगों जैसा रहना चाहते हैं | उन्होंने तुझे दुःख उठाके इसलिए नहीं पढाया , अपना सुख छोड़कर तुझे अच्छा वातावरण इसलिए दिया कि तू खुद भी सुखी रहेगा और उन सबको भी आराम देगा | ये सूचना का अधिकार क्या दिमाग ख़राब है तेरा , कोई तेरे अपने घरसे तो कुछ चुरा नहीं रहा अरे सरकार का ही पैसा खा रहा है खाने दे | दीवाना है कि दुसरे के हक के लिए लड़ता है क्या मिलेगा , तेरी तो कोई प्यार भावना घर वालों के लिए है क़ि नहीं | कितने सूचना के तहत अधिकार निकलने वालों को मौत मिली है | पिता का दिल कुछ ज्यादा धड़क जाता है तो माँ का हृदय शायद कुछ रुक जाता यह सोच कर कि उनके लड़के का अंजाम कही ऐसा ही न हो | जिसके खाने का बक्सा घर छुट जाने पर माँ किसी न किसी को स्कूल पहुंचा कर खाना पहुंचती थी क़ि अरविन्द भूखा न रह जाये | आज अरविन्द देश के लिए भूखा है तेरी रोटी में आज वो कुछ नहीं क़ि उसकी भूख मिटे |

अरविन्द इन पचास साठ के अंतर को नहीं पहचान पाए कि समाज किस कदर बदल गया है | आज भरी ट्रेन में बलात्कार होता है अगल बगल लोग बैठे होते हैं या शयन करते रहते हैं | कही कोई सड़क चलते किसी को गोली मार दे तो सारा बाज़ार इस फुर्ती से बंद हो जाता है किसी के मामले में कोई क्यों पड़े | अगर बगल वाले घर में गुंडे मावली लूटमार व् औरतों कि इज्ज़त लुटते हो तो पडोसी धीरे से अपना किवाड़ बंद कर तेज आवाज में टी ० वी० चला देता है | और जब सब कुछ गुजर जाये तो झूठे आंसू बहा कर कह दे कि कुछ पता नहीं चला | जिस जगह लोग धर्म नाम पर पागल व् हिंसक हो उठते हों उन्माद में जाने देते हों और विवेक से केवल अपने फायेदे कि बात सोचते हो |इस जगह स्वराज की कल्पना इस युग में महज सजावटी शब्द हो सकता जिसके कोई अर्थ न हों |

अरविन्द जंतर मंतर पर आठ दस दिन अपने रक्त की शर्करा के ऊपर नीचे होने से अपने जीवन की आहुति रोज़ दे रहे है | यहाँ आज वो जन सैलाब जिसे तमाशा भी कहें नहीं है | हर आदमी जो कुछ फोटो देख सका है जान सकता है कि बीमार आदमी कैसा दीखता है | जिसकी देश पर मर मिटने कि सनक वह भी उस ज़माने जब लोग आत्मा नहीं पुद्गल हो गए हों जब हर चीज़ तमशा और बाज़ार बन गयी हो | कहाँ कोई रंग दिखा पायेगी यह शहादत | जगाया तो उसे जो सोया हो , सोने का अभिनय करके जो आँखे मूंदा हो वह कैसे आँखे खोलेगा | मैं क्यों अपनी मीठी नीद और सुख क्यूँ त्यागूँ जब तक भ्रष्टाचार स्वयं आतंक बनकर मेरे घर को तहस नहस न कर दे | जब मेरे को भ्रष्टाचार अपने अनगिनत रूपों में से किसी एक रूप में जब डसेगा , उस समय मेरा पड़ोस वाला इसी चिंतन के साथ सो जायेगा क्योंकि उसकी बारी कभी नहीं आएगी जैसा मैं सोच करता था |

तेरा वैभव अमर रहे माँ हम दिन चार रहे न रहें ….”
अरविन्द रैली से बोल कर गाड़ी में बैठते ही खाने को कुछ माँगा करता था ! मेरे मज़ाक उड़ने पर उस का कहना था कि शुगर के कारण जल्दी ही कुछ न खा सकूँ तो घबराहट होने लगती है ! आज पाँच दिन हो गए ! कल माँ ने उस के माथे पर हाथ फिराया तो मुझे उस की वो भूख याद आ गयी ! पर हम लड़ेंगे साथी ….
जंतर-मंतर इस वक़्त देश-धर्म की इक ऐसी पुण्य-वेदी है जिस ने उस के दर्शन न किये वो भी क्या जिया ! जय हिंद !



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21 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

SushmaGupta के द्वारा
December 6, 2012

राज जी ,सादर अभिबादन ,आपकी अरविन्द के लिए संवेदनात्मक विवेचना जनमानस को भी उत्साहित करती है..इस हेतु बहुत वधाई …

jlsingh के द्वारा
August 4, 2012

कुछ आहट सी हो रही है, भ्रष्टाचारी, आतंकवादी, बलात्कारी ….. आदि आ रहे हैं … मैं भी अपने घर के दरवाजे बंद करता हूँ…. टी वी में ख़बरें आ रही है …. उसी बुद्धू बक्से से दुन्य देख लूँगा, फिर आंखे बंदकर सोने का नाटक करूंगा! कल काम पर भी तो जाना है. उसी तंत्र का हिस्सा बनने! जो होता है कहते हैं, अच्छे के लिए ही होता है ! अब भी अनगिनत मांएं अपने सपूतों के सर सहला रही हैं, पैदा करने से बाज नहीं आ रही सपूतों को…. पूत कपूत तो क्या धन संचै, पूत सपूत तो क्या धन संचै! चादर खींच कर मुंह भी ढँक लेता हूँ. कान पर दोनों हाथ रखकर न सुनने की कोशिश कर रहा हूँ….. अरविन्द जग गया है … लगता है, नई जोश नई स्फूर्ति के साथ फिर आयेगा सामने … समर्थन तो चाहिए होगा.

    RAJEEV के द्वारा
    August 4, 2012

    सही ही कहा आपने इस महा शुन्य से ही नई शुरुआत होगी कंही gahre अंधकार से ही एक नई किरण jab समाज व् अवं जागेगा | चाहे राजनीत में कोई आ जाये अब आम जनता को भोगने bajaye bhrishton को bhagane wali bhumika में आना होगा अपना tatkalik swarth वह चाहे जाती से juda ho ya vyaktigat tilanjali de na होगा

hbsingh के द्वारा
August 4, 2012

बाद के घोषणाओ ने तो इस त्याग को धूमिल सा कर दिया . मसलन बिना वजह अनशन तोड़ने की और राजनितिक बिकल्प देने की .

    RAJEEV के द्वारा
    August 4, 2012

    Kamse कम कुछ माहोल जनता को बनाना hoga की राजनीती में khade log aapradhik प्रवृति के na hon जिससे वे कुछ अधिकारी जो samay samay par aate hi rahenge bemuat samay से pahle न मारे जाये | खौफ मिटने से कई बुरे आचरण khud band ho jayenge shukriya singh sahab

Shruti के द्वारा
August 3, 2012

अरविन्द जी जिंदाबाद

ajaykr के द्वारा
August 2, 2012

आदरणीय राज साहब, सादर प्रणाम | अरविन्द जी जिंदाबाद |मनीष जी जिंदाबाद |अन्ना हजारे जिंदाबाद | हम अन्ना के साथ हैं ………………. ******************************* हौसला रख दोस्त ! वो मंज़र1 भी जरूर ही , आयेगा प्यासेके पास चल के , अभी , समन्दर भी आयेगा थक के न बैठ , न हार हिम्मत , ऐ मंजिले – मुसाफिर ; मंजिल भी आएगी , चलने , थकने , का मज़ा भी आयेगा 1 – दृश्य /अवस्था / स्थिति

    RAJEEV के द्वारा
    August 2, 2012

    जरुर ही इस रात की सुबह होगी , रात जितनी भी गमगीन होगी सुबह उतनी ही रंगीन होगी

akraktale के द्वारा
August 2, 2012

आदरणीय सादर, देश में भ्रष्टाचार किस कदर फ़ैल चुका है यह तो उसकी बानगी है की आज तक सरकार और संसद में बैठा कोई भी बन्दा उस कुर्सी का मोह नहीं त्याग सका है.एक अरविन्दजी की ही बात नहीं है सारा देश यदि मरणासन्न पडा होगा तब भी शायद इनको अपनी कुर्सी ही ज्यादा प्यारी होगी.

    RaJ के द्वारा
    August 2, 2012

    अशोक जी आपका आकलन बिलकुल सही है हालात ऐसे ही हैं क्योंकि सरकारे जब अपने तौर tarikon तानाशाह हो जाती हैं तो अराजकता व् रक्तपात शुरू हो जाता है शायद देश उधर ही रहा है

pritish1 के द्वारा
August 2, 2012
    RaJ के द्वारा
    August 2, 2012

    जय हिंद जय bharat

manoranjanthakur के द्वारा
August 2, 2012

वैभव अमर रहे माँ हम दिन चार रहे न रहें आज का जमाना ही यही है बस आख पर पट्टी बाध लो बधाई

    RaJ के द्वारा
    August 2, 2012

    मनोरंजन जी बहुत बड़े सामाजिक परिवर्तन की जरुरत है समाज गह्सी नींद में है

shashibhushan1959 के द्वारा
August 2, 2012

आदरणीय राज जी, सादर ! “”"जंतर-मंतर इस वक़्त देश-धर्म की इक ऐसी पुण्य-वेदी है जिस ने उस के दर्शन न किये वो भी क्या जिया ! जय हिंद !”"”" आपके आह्वान को नमन एवं हार्दिक समर्थन ! वन्दे मातरम् !!!

    RaJ के द्वारा
    August 2, 2012

    वन्देमातरम शशि जी

bharodiya के द्वारा
August 2, 2012

भाईसाहब अन्ना जैसा राष्टपति और केजरीवाल जैसे प्रधानमंत्री का ख्वाब मत तोडो । अब तो यही जरूरी है । अब तो खुल के मैदानमें आना पडेगा । उन की ना ना को हां हां में बदलना होगा । नही माने तो टांगे खींच के लाना होगा । http://bharodiya.jagranjunction.com/2012/08/02/%E0%A4%86%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%BE-%E0%A4%95%E0%A4%B9%E0%A5%87-%E0%A4%96%E0%A4%82%E0%A4%9C%E0%A4%B0-%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B2-%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%AE%E0%A4%BE/

    RaJ के द्वारा
    August 2, 2012

    भदोरिया जी , भले और इमानदार लोगों का राजनीती से स्वयं को अलग कर लेना भी एक कारण है भ्रष्टाचार का

    bharodiya के द्वारा
    August 2, 2012

    अब आ गए । मैं चार दिन से सोचता था, ईन को आना चाहिए । आखिर आ गए ।

dineshaastik के द्वारा
August 2, 2012

आदणीय राज जी, सादर नमस्कार। आन्दोलित कर दिया आपकी रचना ने…..पस्तुति के लिये बधाई…. उस माँ को शत शत नमन…जिसने अरविन्द जैसा सपूत पैदा किया।

    RaJ के द्वारा
    August 2, 2012

    दिनेश जी आपके साथ में भी उस जननी माँ को naman करता हूँ


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