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RaJ


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कायदों का शहर _____

Posted On: 22 Apr, 2012 Others में

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vincent series16

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अपने कंधे पर सिर रखकर कोई रोता नहीं है
सीने पर सिर अपना रखकर कोई सोता नहीं है

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इन्सान इतना तंगदिल हो गया क्यूँ है
हंसने मुस्कराने पर लगा कर्फ्यू सा क्यूँ है

:

आदमी आदमी खुलकर मिलता नहीं है
बात बिना बात यूँ ही कोई करता नहीं है

:

जो खोल लेता दिल अगर लोगों के साथ
आज न खोलना पड़ता औजारों के साथ

:

लोगों से   न मिलने को व्यस्तता का बहना बहुत है
फेस बुक लगा रातों को जामवाड़ा बहुत है

:

इन्सान का इन्सान पर भरोसा कहीं खो गया है
भगवान् की दुकानों का बाज़ार खड़ा हो गया है

:

दुनिया को फोन लगाने में सख्स कितना मस्त है
अपने डायल करो तो सारी लाइने व्यस्त हैं

:

कायदों का शहर है मिलना तो कुछ फासला रखना
हाथ भी न मिलायेंगे जो गले मिलोगे तपाक से



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32 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

shashibhushan1959 के द्वारा
April 23, 2012

आदरणीय राज जी, सादर ! वाह ……!!!!!! क्या बात है …….!! सच्चाई के अत्यधिक करीब ! समयोचित रचना ! अंतर्मन को कुरेदती हुई ! हार्दिक बधाई !

    RaJ के द्वारा
    April 23, 2012

    शशि जी अभी अभी आपकी नवीनतम रचना पर में था और आप मेरी एक छोटी सी रचना पर लिख रहे थे क्या टायमिंग रही शशि जी आभार

    shashibhushan1959 के द्वारा
    April 23, 2012

    आदरणीय राज जी, सादर ! यही तो सहज प्रेम है ! दिली लगाव है ! स्नेह का आकर्षण है !

krishnashri के द्वारा
April 23, 2012

आदरणीय राज जी , सप्रेम नमस्कार , आदमी आदमी खुल कर मिलता नहीं है बात बिना बात यूँ ही कोई करता नहीं है बहुत खुबसूरत पंक्तियाँ , बधाई स्वीकार करें .

    raj के द्वारा
    April 23, 2012

    पहली बार मेंरे ब्लॉग पर आने का बहुत बहुत शुक्रिया व तारीफ के लिए धन्यवाद अलग से

yogi sarswat के द्वारा
April 23, 2012

कायदों का शहर है मिलना तो कुछ फासला रखना हाथ भी न मिलायेंगे जो गले मिलोगे तपाक से बहुत बहुत सुन्दर शब्द ! बहुत खूब ! राज साब , बहुत खूब अल्फाज़ लिखे हैं आपने !

    RaJ के द्वारा
    April 23, 2012

    योगी जी जिंदगी वस्विक्तायें है जिनसे रोज़ दो चार होते रहते हैं शब्दों सहारा बनकर यदि आप तक पहुँच पायीं यकीं करिए में सफल हुआ ऐसे ही आपका प्यार मिला तो फिर खिदमत में हाज़िर होऊंगा

rekhafbd के द्वारा
April 23, 2012

आदरणीय राज जी , आदमी आदमी खुल कर मिलता नहीं है बात बिना बात यूँ ही कोई करता नहीं है एक बढ़िया रचना बधाई

    RaJ के द्वारा
    April 23, 2012

    रेखाजी बहुत बहुत शुक्रिया हौसला बढ़ने के लिए

dineshaastik के द्वारा
April 23, 2012

इन्सान इतना तंगदिल हो गया क्यूँ है हंसने मुस्कराने पर लगा कर्फ्यू सा क्यूँ है : आदमी आदमी खुलकर मिलता नहीं है बात बिना बात यूँ ही कोई करता नहीं है जो राज था आज हो गया उजागर, तंगदिल इंसान खुलकर मिलता क्यों नहीं। बधाई……

    RaJ के द्वारा
    April 23, 2012

    दिनेश जी अपने मेरी रचना को खुलके पढ़ा व खुलकर सराहा धन्यवाद

vikramjitsingh के द्वारा
April 22, 2012

राज जी……सादर बहुत सुन्दर इंसानी ज़ज्बात….. ”घर से तो बहुत दूर है, मंदिर का रास्ता, आओ किसी रोते हुए चेहरे को हंसाएं……..”

    raj के द्वारा
    April 22, 2012

    विक्रम जित साहब आपके जज्बातों की में कद्र करता हूँ आपका आभारी

Rajkamal Sharma के द्वारा
April 22, 2012

ऐसा लग रहा है की इसको पहले भी पढ़ा है एक बात कहनी चाहूँगा की अगर आज के समय में किसी मित्र रिश्तेदार के पास चले जायो (अकारण ) तो वोह बाद में यही कहेगा की आया तो था कुछ “काम” से लेकिन कहने (मांगने ) की हिम्मत नहीं पड़ी या फिर इस बात पर घंटो बर्बाद कर दिए जाते है की राजकमल के आने का सबब आखिरकार क्या था (शायद उस समय भी मैंने इससे मिलती जुलती प्रतिकिर्या ही दी होगी ) :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :|

    raj के द्वारा
    April 22, 2012

    राजकमल जी बाकई सभी लोग कुछ न कुछ मकसद लिए घूमते कभी ऐसे लम्हे भी होने चाहिए जिनका कोई मतलब न हो आदमी केवल मिलने को आजाये की उस पर रहा ही नजाए बस मकसद न हो तो देखो मुलाकात का मज़ा ही क्या और हो ., इंसा कहीं खड़ा जा रहा हो बस अपनी मस्ती में कोई मतलब न हो कई बार ऐसा लगता है कोई कभी मिला है कुछ ऐसा ही कही पढ़ा है मज़ा इसी में इसे यहीं छोड़कर यूँ ही जी लिया जाये हमेशा की तरह राजकमल जी कुछ न कुछ लिखवा लेते हो केवल शुक्रिया कहाँ कहने देते हो

Santosh Kumar के द्वारा
April 22, 2012

आदरणीय राज जी ,.सादर प्रणाम हमेशा की तरह सुन्दर अभिव्यक्ति पर कृपया बधाई स्वीकारें ..सादर

    raj के द्वारा
    April 22, 2012

    चन्दन भाई आपका हमेशा की तरह ऋणी रहूँगा की आपने सराहना के शब्द मुझ तक पहुचाये आगे भी आपका प्यार मिलेगा

    raj के द्वारा
    April 22, 2012

    संतोष जी आपका आभार चन्दन भाई नाम लिख गया था पर आप दोनों को ही शुक्रिया कहना था

चन्दन राय के द्वारा
April 22, 2012

सर , पर हम सबने इस वासु वसुधा को नोच नोच इक असहाए अबला बना दिया , इसके सारे आभूषण उतार इसे कुरूप कर दिया है , आओ धरा बचाए

    raj के द्वारा
    April 22, 2012

    चन्दन जी बहुत ही विचारणीय विषय की जिस तरह धरा का दोहन धनवान अपने ऐशो आराम के लिए कर रहे है वह दहरती पर भरी पढ़ रहा है

चन्दन राय के द्वारा
April 22, 2012

राज सर , बहुत बेहतरीन गजल , आज इंसान की हालत बस ऐसी है , मुझे शहरयार साहब की गजल याद आ गई , सीने में जलन , आँखों में तूफ़ान क्यूँ हैं , इस शहर में हर इंसान इतना परेशां क्यूँ हैं

    raj के द्वारा
    April 22, 2012

    शुक्रिया के लिए शब्द नहीं बहुत धन्यवाद

April 22, 2012

सादर प्रणाम, सर! आदमी आदमी खुलकर मिलता नहीं है, हँसने मुस्कुराने पर लगा कर्फ्यू सा क्यों…….जी बहुत खूब. आपकी इस काव्य ने दिल और दिमाग को झक-झोर कर रख दिया… आपकी इस कृति से मेरे द्वारा आअज से ७ साल पहले रचित एक कृति याद आ गयी…….कोशिश करूँगा कि नंगों की बस्ती में नंगापन, एक गुनाह!-खंड३ के साथ आप सभ के बीच रखु………..जाते-जाते एक बात रखना चाहूँगा……आज आप जैसे ही कुछ लोगों के कारन यह दुनिया खुब्सुएअत सी लगती है….

    raj के द्वारा
    April 22, 2012

    अनिल जी आपकी रचना का तीसरे खंड का बेसब्री से इंतजार रहेगा बाकी मेरी इस करती को सराहने के लिए कोटिश धन्यवाद

Rajesh Dubey के द्वारा
April 22, 2012

आदमी के अन्दर तक पड़ताल करती सुन्दर कविता. आज के समय में बिलकुल प्रासंगिक. कायदों के शहर में हाथ भी न मिलायेंगे. बहुत सुन्दर.

    raj के द्वारा
    April 22, 2012

    राजेश दुबे जी बहुत बहुत धन्यवाद

akraktale के द्वारा
April 22, 2012

राज साहब सादर नमस्कार, इन्सान इतना तंगदिल हो गया क्यूँ है हंसने मुस्कराने पर लगा कर्फ्यू सा क्यूँ है इंसान के तंगदिली की दास्ताँ बयां करती सुन्दर रचना. अब तो सारे रिश्ते नाते मशीनी हो गए हैं.बधाई. :

    raj के द्वारा
    April 22, 2012

    पोस्ट पर आने और रचना को पसंद करने के लिए धन्यवाद अशोक जी

nishamittal के द्वारा
April 22, 2012

राज जी,आदमी की कुंठाएं.परस्पर औपचारिक होते सम्पर्क ,अपनों से बढ़ती दूरियां सच बहुत ही दुखद स्थिति है,आपको अच्छी भावनाप्रधान रचना के लिए बधाई

    raj के द्वारा
    April 22, 2012

    निशा जी आपकी सटीक टिपण्णी से हमेशा सहस बाद जाता फिर कुछ लुखने का शुक्रिया

sombir singh saroya के द्वारा
April 22, 2012

इन्सान का इन्सान पर भरोसा कहीं खो गया है भगवान् की दुकानों का बाज़ार खड़ा हो गया है आदमी की व्यस्त ता और दुनिया से बेरुखी को जो आपने शब्दों में पिरोकर पेश किया है वो काबिले तारीफ है

    raj के द्वारा
    April 22, 2012

    सोमवीर जी आपकी मेरे पोस्ट पर प्रथम आमद की मिजाजपुर्सी में करता हूँ व धन्यवाद करता हूँ कि आपने रचना पसंद की


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