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RaJ


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उजड़ता आशियाना .......

Posted On: 30 Mar, 2012 में

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images tree no leaves

उजड़ता आशियाना …….

कभी पेड़ जो , हरा भरा था
चिढ़ा- चिढ़ी ने घोंसला धरा था

;

पल पल लाते, तिनके सारे
थक थक जाते, वे बेचारे

;

घोंसला जरा यूँ ही, हिल जाता
चिढ़ा- चिढ़ी का, धीरज जाता

;

आँखों में थी,  रातें बीतीं
जागकर सब, मुश्किलें थी जीतीं

;

रात हवा ने नुकसान कर दिया
घोंसला सारा, बर्बाद कर दिया

;

चिढ़ा – चिढ़ी का दिल घबराया
फिर एक  दूजे का हौसला बढ़ाया

;

चिढ़ा बिखरे तिनके ले आया
चिढ़ी ने तुरत ही घोंसला छाया

;

इंतजार अब ख़त्म हो गया
दो अंडो का जन्म हो गया

;

चिढ़ी घोंसले में अंडों को सेती
चिढ़ा की गद्दी डाली पे रहती

;

गर्मी पाकर कवच था टूटा
उसमें फिर अंकुर  था फूटा

;

घोंसले में ची ची की आवाजें
चिढ़ी चोंच में भोजन ला दे

;

नन्ही नन्ही  चोंचे खुलती
चिढ़ी उसमें खाना  थी धरती

;

नव जीवन की नई हिलोरें
चिचियाने से होती भोरें

;

एक दिन फिर वो भी था  आया
बच्चों ने जब पर फैलाया

;

चिढ़ी ने अब फैसला ले लिया
उनको अपने संग ले लिया

;

बच्चों में था उत्साह निराला
पहली बार देखा उजियारा

;

चिढ़ी खुद आगे हो जाती
पीछे पीछे बच्चों को बुलाती

;

चूजों के चहकते गीत
गूंजा देते जीवन संगीत

समय उड़ा कब पंख लगाकर
चिढ़ी को समझ न आया था तब

;

बच्चों के पर मजबूत हो गये
चिढ़ी से वो आज़ाद हो गये

“”

ची ची की आवाजें, न  थीं
पंख  फड़ फड़ाने की , गुंजाईश कब  थी

;

जीवन का था  राग सो गया
बिन गुंजन के सुबह हो गया

;

दूर -दूर था नीरव फैला
कर्कश स्वर ने निर्जन भेदा

;

मौसम के थे रंग बदलते
पत्ते पीले हो के ,   गिरते

;

रात  थी ठंडी, चली  तेज बयार
घोंसला हो गया, तार तार

;

आंधी तूफान कहर था बरपा
आसमान से प्रलय था बरसा

;

घोसले का अस्तित्व मिट गया
पेड़ तो जैसे नग्न हो गया

;

मौसम सतरंगी , जहाँ रहा था
आज वहां पर, धुआं धुआं था

;

आँखे निहार रही आकाश
चिढ़ा चिढ़ी में , बची न जान

;

काया केवल शेष रह गयी
सांसों की अब डोर थम गयी

;

पेड़  कभी जो हरा भरा था
आज वहां बस ठूंठ खड़ा था


राजीव जैन ” राज़”

इस मंच पर एक अन्तराल के बाद उपस्थिति दर्ज करा रहा हूँ आशा करता हूँ पहले तरह ही आपका स्नेह व् आशीर्वाद इस रचना को मिलेगा



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20 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
April 2, 2012

बच्चों के पर मजबूत हो गये चिढ़ी से वो आज़ाद हो गये “ “ “” ची ची की आवाजें, न थीं पंख फड़ फड़ाने की , गुंजाईश कब थी मौसम सतरंगी , जहाँ रहा था आज वहां पर, धुआं धुआं था ; आँखे निहार रही आकाश चिढ़ा चिढ़ी में , बची न जान प्रिय राज जी अद्भुत जीवन दर्शन ….यही तो है जिंदगानी ..साड़ी कहानी ..बस जिनके लिए मरे पर मजबूत होते ही वे उड़े …जय श्री राधे आँखें खोलती हुयी रचना बधाई हो भ्रमर ५ ;

    surendra shukla bhramar5 के द्वारा
    April 2, 2012

    प्रिय राज जी चिड़िया के लिए चिड़ा -चिड़ी, या चिढ़ा -चिढ़ी ? हम तो चिड़ा -चिड़ी ही बोलते रहे हैं ..ये कहीं की स्थानीय भाषा है क्या ? भ्रमर ५

    raj के द्वारा
    April 2, 2012

    सुरेन्द्र भ्रमर जी , एक धार्मिक प्रवचन देने वाले एक जैन पंडित जो बुंदेलखंड के थे एक कथा में चिढ़ा चिढ़ी करके कथा सुना रहे थे बैसे भी बुंदेलखंड में हिदी के शब्दों में स्वर की ध्वनि कुछ अलग रहती वहीँ से कुछ प्रभाव रचना में अ गया है रचना पर आपके अमूल्य विचार के लिए धन्यवाद

चन्दन राय के द्वारा
April 1, 2012

Dear Sir, बहुत ही उम्दा अभिव्यक्ति , उत्तम भाव रस छलकता है हर पंक्ति से आपका अनुज चन्दन राय

    raj के द्वारा
    April 1, 2012

    चन्दन भाई आपका स्नेह मिला रचना को आपने पसंद किया बधाई

rekhafbd के द्वारा
April 1, 2012

आदरणीय राज जी ,आपने चिड़ी चिड़े के माध्यम से जिंदगी की सच्चाई बयां की ,अति सुंदर रचना |

    RaJ के द्वारा
    April 1, 2012

    आपको rachna अच्छी लगी बड़ी बात मेरे लिए दूसरी नहीं है धन्यवाद रेखा जी

akraktale के द्वारा
April 1, 2012

राज जी सादर नमस्कार, काफी अंतराल बाद आपका पुनरागमन हुआ है किन्तु आप ने बहुत ही सुन्दर मर्म स्पर्शी रचना प्रस्तुत करके इस अंतराल को एकदम समेट दिया है.पहले नवजीवन का संचार और फिर सूर्यास्त. शब्द संयोजन के साथ ही कविता के भाव बहुत ही प्रभावित कर रहे हैं. बधाई.

    raj के द्वारा
    April 1, 2012

    raktale साहब आप मंच पर उन चंद लोगों में जिनकी सोच काफी व्यापक परिपक्व व व्यव्हार से दूसरों के समझने की अद्भुत क्षमता वाला है . आपको कविता के भाव परबह्वित कर पाए इसके लिए शुक्रिया http://www.jrajeev.jagranjunction.com

dineshaastik के द्वारा
April 1, 2012

सुन्दर भावों के अभिव्यक्त करती रचन निःसंदेह ही सराहनीय है…..बधाई…

    raj के द्वारा
    April 1, 2012

    दिनेश जी आपने कविता को न केवल पढ़ा बल्कि सराहा भी बहुत बहुत धन्यवाद उम्मीद है आगे भी ऐसा ही स्नेह मिलता रहेगा

March 31, 2012

दो पक्षियों के माध्यम से समाज के एक ऐसे कटु सत्य को उजागर करती हुई रचना जो दिन पर दिन सोचनीय और चिंतनीय होती जा रही है….हार्दिक आभार. अगर कभी फुर्सत में हो तो मेरी अधूरी प्रेम कहानी पर अपनी प्रतिक्रिया जरुर देना चाहें……

RaJ के द्वारा
March 31, 2012

निशा जी रचना पढने और पसंद करने के लिए शुक्रिया , व्यस्तता के कारन यहाँ लिखना न हो पाया उसके लिए माफ़ी चाहूँगा

nishamittal के द्वारा
March 31, 2012

राज जी,इतना लम्बा अन्तराल ! परन्तु जीवन के क्रम पर प्रकाश डालती चिडे चिड़िया वाली ये रचना बहुत अच्छी लगी.

minujha के द्वारा
March 31, 2012

राज जी एक लंबे अरसे बाद आपकी उपस्थिति,जिंदगी के करीब एक बेहद खूबसूरत रचना के साथ अच्छी लगी.

    RaJ के द्वारा
    March 31, 2012

    रचना पसंद आने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया आप लोगों का स्नेह पुनः मंच पर लिखने को मजबूर करता रहता है धन्यवाद

ajaydubeydeoria के द्वारा
March 31, 2012

सुन्दर कविता.

    RaJ के द्वारा
    March 31, 2012

    ajay दुबे जी धन्यवाद ऐसे ही उत्साह बढ़ाते रहिये


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