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जो आज सोयेगे - कल अपने बच्चो को मिस्र देंगे- jagran junction forum

Posted On: 2 Jan, 2012 Others में

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1. क्या अन्ना और उनकी टीम द्वारा चलाया गया आंदोलन अपनी प्रासंगिकता खो चुका है?

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आज बच्चो को स्कूल ले जाती एक बस, ड्राईवर के ट्रक के सामने आने से , नियंत्रण खोने से खाई में गिर गयी |
कारण:-
सुप्रीम कोर्ट द्वारा बार बार निर्धारित किये गए एक भी कायदे को पूरा नहीं किया गया | ८ बच्चों को बैठाने की जगह २९ बच्चे | फर्स्ट ऐड बाक्स नदारद | कंडक्टर और स्कूल स्टाफ मौजूद नहीं | बस को सफेटी प्रमाण पत्र नहीं | यह सब सहूलियत आपको मिलती है आपको थोड़ी सी सुविधा शुल्क , इन चीज़ों को चेक करने वालों को, देने से |
कोल कता के सुपर स्पेसिलिटी हॉस्पिटल में आग लग जाने से गहन चिकित्सा क क्ष में life support में बंधे मरीजों का घुट घुट कर मर जाना
कारण :-
कुछ लेन देन करके safety प्रमाण पत्र मिल जाने से , निरिक्षण करने आये अमले को रिश्वत दे दो |

पोलिओ की बुँदे पीते ही बच्चे बुखार आकार अकड़ गए और बुखार आया और हालत गंभीर हुई और बचाए न जा सके

कारण :-
कोल्ड श्रंखला को ठीक ठाक न रखने से दवाई दूषित हो गयी , फिर वही कोताही ,

नकली दवाई जान पर भरी पड़ी

drug inspector नियमित किश्त उठा रहे है कोई ईमानदारी से निरिक्षण नहीं | मावे में मिलावट , जहरीली शराब कितने आदमी मरे कोई गिनती नहीं , कितने घर के चूल्हे बुझे पता नहीं | कितनी आत्महत्या हो गयी पैसा नहीं दिया नौकरी नहीं मिली | जबलपुर में तो मेडिकल छात्राएं अपनी अस्मत का सौदा करके पास होने को मजबूर हो गयीं और आप विश्वास करेंगे वे आगे डाक्टर बनेगी |
कारण? कारण? कारण ?
भ्रष्टाचार का दावानल , निगल रहा पुरे समाज को

कही drug माफिया, देश की सुरक्षा बेचते agent कारण , रिश्वत सीधे स्विस बैंक खतों में
आर टी आई कार्यकर्ता मौत के घाट
कारण :
भ्रष्टाचार जिसका संरक्षण या सीधी लिप्तता सीधे मंत्रिओं राजनीतिज्ञों की |
इन्ही के द्वारा दिया जा रही दलील है जो जागरण जंक्शन द्वारा हमारे सामने भी रखी गयी है ?
इस आन्दोलन की प्रासंगिकता को ही प्रश्न चिन्ह लगाना ऐसा लगा जैसे कोई अमेरिका की agency सर्वे करा रही हो जो इस हिंदुस्तान में न रहती हो और जिसे न पता हो की भ्रष्टाचार का नासूर किस कदर आम भारतीय की जिंदगी बर्बाद कर रहा है | कभी कभी न दिखाई देने वाले तरीकों से नर संहार कर रहा है |
में क्या निर्णय दूँ प्रासंगिकता पर ??? हो सकता मंच पर उपस्थित लोग भी मन ही मन आक्रोशित हों पर भावावेश रोककर संयमित होकर मुझसे अच्छा उत्तर आपको दें|

2. क्या इस आंदोलन के कारण ही सरकार को लोकपाल विधेयक लाने पर मजबूर होना पड़ा?

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४२ वर्ष के कुम्भ्करनी नींद से अचानक जागने के कारण सकपकाहट में सरकार हबड़ तबड़ में लोक पाल का नाम देकर एक puppet या बिजुका ले कर आगई | कोई भी नादान बता देगा की अन्ना की अचानक हुकार और लाखों की स्वतः स्फूर्त भीड़ से डर कर फौरी तौर पर सारे वायदों का पुलिंदा लिखित में देकर दिल्ली के रामलीला मैदान पहुंची | यह राजनितिक जमात किस कदर निक्कमी और मक्कार है आम आदमी रोज़ हर चौराहे , हर शराब के ठिकाने पर इसकी ताज्दिक करता है , पर जुगाली करके सिस्टम को गाली देते हुए पण की पीक में थूक कर बढ जाता है | शायद शराबखाने की इज़ाज़त अन्ना के आस पास बिलकुल नहीं है पर यह भी सही कि समाज के दिए दर्द, आक्रोश , system का सड़ा गला पन साफ साफ यहीं सुनाई देता है | हर जगह भ्रष्टाचार की कहानी और उससे पैदा सामाजिक विद्रूप रोज़ दिखाई देते है | रूस की क्रांति से सम्बन्धित साहित्य दबी कुचली जनता में शराब और मार पीट का कारण उनके अन्दर सिस्टम के खिलाफ पल रहे आक्रोश की परणित को माना है |

3. मुंबई में आंदोलन को स्थगित करने का क्या मतलब निकाला जाना चाहिए?

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निश्चित ही अगस्त में सरकार को यह समय नहीं मिला की वह जनता के सामने कोई पेंच ऐसा डाल पाती | पर इन चार माह में बजाय भ्रष्टाचार के खिलाफ कोई कानून बनाने की कोशिश के उन्होंने इस मामले को विभिन्न दिशाओं में भटकाने की कोशिश की | इस भ्रष्टाचार के महासमुन्दर में उन्होंने अन्ना के नजदीक लोगों में छोटी खामिया उजागर करवाई | इसमें हर बार की तरह सरकार की जी हजुरी मशगुल सरकारी तंत्र \ Income Tax / CBI में मिल ही गए | आंदोलनों का एक धार पर चलना लगभग मुश्किल है | यह स्थगन अब जनता को देना इसलिए जरुरी हो गया है क्योंकि घटनाये जिस तेज गति से घूमी उसमें कई बार आन्दोलन दिशाएं और उनका निर्धारण कर पाना दिल से हिंदुस्तान के लिए कुर्बान करने वाले अन्ना के बस में भी न रहा | अब कहीं कहीं वही जनता जो एक दिन शिव सेना के डर से , खास तौर से bollywood मुंबई में अनशन की जगह नहीं पहुंचा , उन्ही भ्रष्ट अफसरों के तलबे चाटें और बार बार ओने समय ख़राब करें जो निश्चित ही कड़े कानून के बनाने से डरते | जनता अन्ना के absence के vacume को तब फिर महसूस करेगी जब भ्रष्टाचार की कोई करतूत उनसे उनकी जिंदगी इज्ज़त मांगने पर उतारू होगी |

4. इस आंदोलन के दूरगामी परिणाम के विषय में क्या कयास लगाया जा सकता है?

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इस आन्दोलन का दूरगामी अर्थ शायद हर सरकार ही नहीं इस व्यवस्था के लिए चेतावनी भरा ही है \ एक बार उठा जन सैलाव जिसे व्यक्तिओं पर चारित्रिक हमले कराके फौरी तौर पर रोका गया है | हर रोज भ्रष्टाचार के शिकार होने पर पहले से अन्ना द्वरा जनमानस के दिमाग में डाली बात से पुनर्जाग्रत हो जाएगा | आंदोलनों को सकारत्मक न लेने का रवैया हर निरंकुश सरकार में होता ही है | प्रतिफल में होती है हिंसा और उस ज्वाला का रूप इतना बड़ा और मंजर इतना खतरनाक होता है जब गद्दाफी जैसा शासक गली में कुत्तों की तरह मरता है पर विभीषिका यह है की आधी से ज्यादा जनता हिंसा से प्रभावित होकर अपना कोई न कोई सदस्य खो देती है | अभी वक़्त गया नहीं जब आम आदमी इसे पूजा की तरह अपना धर्म माने की जब अन्ना अनशन पर हों तो कमसे कम चुपचाप सड़कों किनारे खड़े रहना वाहन नहीं रोकना मरीज को इलाज को जाने देना, बस कागज पर कहना अब करप्शन और नहीं |



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21 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

dineshaastik के द्वारा
January 22, 2012

कृपया इसे भी पढ़े– आयुर्वेदिक दिनेश के दोहे भाग-2 http://dineshaastik.jagranjunction.com/

vishleshak के द्वारा
January 8, 2012

राज जी,मेरा भी मानना है कि न तो यह आन्दोलन विफल हुआ है और न ही विफल होगा ।वास्तविकता तो यह है कि आदरणीय अन्नाजी ने आम लोगों के दर्द को जु़वान दे दी है ।आज का युवा वर्ग काफ़ी संवेदनशील हो गया है ।खुद भ्रष्ट लोग भी भ्रष्टाचार से परेशान हो गए है ।इन्हीं सब परिवर्तनों को देखकर तो राजनीतिक पार्टी के लोग भी परेशान हो गए है ।आवश्यकता केवल धैर्य रखने की है ।परिवर्तन तो हो रहा है और वाछंनीय परिवर्तन भी होकरके रहेगा ।सच्चाई और अच्छाई का कोई विकल्प नहीं होता,लोकपाल तो आएगा ही ।आवश्यकता केवल हम सभी को सतत् जागरूक रहने और जागरूक बनाते रहने की है ।विश्लेषक ।

    raj के द्वारा
    January 8, 2012

    विश्लेषक जी आपका कहना बिलकुल सही है जागरूकता को बनाये रखना और उसे फ़ैलाने का सतत प्रयास जारी रखना होगा | सही कहा है अन्ना स्वयं एक आवाज़ है एक पीड़ा की जो जन मानस में व्याप्त है बहुत बहुत धन्यवाद

Tufail A. Siddequi के द्वारा
January 4, 2012

राज जी सादर अभिवादन, यह बिल तो कई सालों से लटका हुआ है, लेकीन गौर करने वाली बात है की अन्ना के आगे आने के बाद से आज यह बात देश के बच्चे-२ को पता लगी है, हम ज्यादा जागरूक हुए हैं. परिवर्तन तो हुआ है. निकट भविष्य में आशा है, मुकाम हासिल हो कर रहेगा. चोट्टईगिरी ज्यादा समय तक नहीं चलती है राज जी. सुन्दर और सार्थक रचना के लिय ढेरों बधाई. http://siddequi.jagranjunction.com

    raj के द्वारा
    January 4, 2012

    धन्यवाद सद्दीकी साहब , आपको धन्यवाद , आपका कहना सही है यह बात अन्ना ने एक बार जनमानस जहन ड़ाल दी है समय समय पर दैनिक भ्रष्टाचार से जब भी आम आदमी दो चार होगा वह आंदोलित होगा फिर अन्ना के रहते या उनके बाद कुछ न कुछ तो होगा ही |

nishamittal के द्वारा
January 4, 2012

आपने दैनिक जीवन से सम्बन्धित महत्वपूर्ण समस्याओं पर विचार करने के लिए एक विषय दिया है,ऐसे आन्दोलन सरकार द्वारा सदा कमजोर किये जाते हैं,समस्या हमारी है कि बिना हासिल किये हम जश्न मनाने के लिए क्यों उत्कंठित थे,जब आन्दोलन चरम पर था तो उसको एकदम समाप्त करना और रुग्न शरीर के साथ पुनः प्रारम्भ कर एकदम समाप्त करदेना जनता के जोश को ठंडा करता है.

    raj के द्वारा
    January 4, 2012

    आपने भारतीय जनमानस में अधिकतर समस्याओं को लेकर तीव्र आवेग उत्पन्न होता और तात्क्षणिक आक्रोश का फूट जाना भी उतना ही सामान्य है अतः जो endurance किसी बदलाव को लाने लिए जरुरी वह यहाँ नहीं है | जरा से समय को गुजर जाने के बाद हम असली मुद्दों से भटक कर जात पांत के झंझट में पड़कर अपने वहुमुल्य वोट या तो डालने ही नहीं जाते या गलत जगह दल आते है | अपने सहूलियत के लिए छोटे मोटे फायेदे के लिए नेताओं का सहारा लेते हैं जो कई बार कानून की द्रष्टि से सही नहीं होते , यहीं से हम अपने स्वाभिमान को जब एक बार बेचते तो बार बार गर्त में जाते है देश में भ्रष्टाचार यूँ ही चलता रहता है |

dineshaastik के द्वारा
January 4, 2012

राज जी अन्ना ने जो चिंगारी जलाई है, वह शीघ्र ही शोला बनेगी। सुबह होने वाली है,स्वागत के लिये तैयार रहें।

    raj के द्वारा
    January 4, 2012

    बिलकुल दिनेश जी उस सुबह के स्वागत में मैं आपके साथ हूँ

akraktale के द्वारा
January 3, 2012

राज जी नमस्कार, सत्य की जीत सुनिश्चित है थोड़ा सा असमंजस आन्दोलन की प्रासंगिकता पर प्रश्न चिन्ह नहीं लगा सकता.सभी को जागरूक होना ही नहीं सरकार को दिखाना भी होगा.

    raj के द्वारा
    January 3, 2012

    अशोक जी समर्थन और इस विश्वास के लिए आभारी कि जंग कामयाब होगी

minujha के द्वारा
January 3, 2012

राज जी नमस्कार, आन्दोलन की प्रासंगिकता पर प्रश्न चिन्ह लगाने का मतलब तो हमारी मानसिकता पर प्रश्नचिन्ह लगाने जैसा है,ये बात जरूर है कि जिसतरह गुलामी से छुटकारा पाने में हमें वर्षों लगे,भ्रष्टाचार भी समय लेगा,पर हमारी सक्रिय भागीदारी अत्यावश्यक है इसके विनाश के लिए,अच्छा आलेख

    raj के द्वारा
    January 3, 2012

    बिलकुल आपका मानना सही है यात्रा लम्बी पर जिन्हें इस मुहीम पर विश्वास है उन्हें धैर्य से हर पल इसके लिए काम करना होगा धन्यवाद मीनू जी

Abdul Rashid के द्वारा
January 3, 2012

हमारे यहाँ चुनाव था एक पढ़े लिखे योग्य व्यक्ति से जब मैंने पूछा जनाब आपने किसको vot दिया है आपने तो उन्होंने कहा फलां पार्टी को मैंने कहा आप जानते है वह कैसा आदमी है उन्होंने जवाब दिया नहीं यह सोंच जब तक कायम रहेगा भ्रष्टाचार नहीं मिट सकता. सुन्दर सार्थक रचना के लिय बधाई सप्रेम अब्दुल रशीद http://singrauli.jagranjunction.com/2012/01/02/यही-संदेश-हमारा/

mparveen के द्वारा
January 3, 2012

राज जी नमस्कार, सिर्फ कानून बनाने से कुछ नहीं होगा उन कानूनों का पालन करवाना जरुरी है और सारा दोष प्रशासन पर नहीं थोपा जा सकता कुछ हद तक इसके जिम्मेदार हम भी हैं क्यूंकि हम कानूनों की अवहेलना कर देते हैं …. आपका लेख अत्यंत सार्थक और स्पस्ट है …. बधाई ….

    RaJ के द्वारा
    January 3, 2012

    आपका feedback hamesha की तरह pathapradarshak रहा जो लोग जो कौम हर मोड़ हर वक़्त जगती नहीं रहती वह सही शासन सही देश सही समाज बनाने के अनुकूल नहीं होती समाज से ही नेता डाक्टर ठेकेदार सभी आते है यदि समाज जागरूक है तो मजाल है लोकतंत्र का ऐसा मजाक बने

Rajesh Dubey के द्वारा
January 3, 2012

जन-आन्दोलन को सरकार गंभीरता से नहीं लेती है,यह बात सही है. पर जो भी हो जनता में राजनैतिक चेतना पैदा हुई है और उसका श्रेय अन्ना को ही है.

    raj के द्वारा
    January 3, 2012

    अब जनता की बारी है कि इस आन्दोलन को इतनी प्रकार से जिन्दा रखे कि कोई जन प्रतिनिधि अपने को मालिक वो भी लुटेरा brand ka chun kar hi न आये धन्यवाद दुबे ji

Santosh Kumar के द्वारा
January 3, 2012

आदरणीय राज जी ,.सादर अभिवादन अत्यंत सार्थक आलेख के लिए हार्दिक अभिनन्दन आपका ,…. हमें नित्य भ्रष्टाचार का दानव निगल रहा है ,..व्यवस्था ही मानवता की दुश्मन बनी है ,..इंसानियत को हिन्सानियत में बदलने से पहले हम नहीं जागे तो अपने बच्चों के भविष्य का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है ,…..आन्दोलन की प्रासंगिकता पर प्रश्न मुझे भी अखरा था …..लेकिन आपके आलेख ने इस प्रश्न को सार्थक बना दिया ,…आपके बेबाक लेखन को नमन

    raj के द्वारा
    January 3, 2012

    संतोष जी भ्रष्टाचार का सुरसा की तरह हमारे system में पैठ कर जाना और उस पर तुर्रा यह कि यह कोई पूछे कि इसके खिलाफ आन्दोलन कि प्रासंगिकता है तो समझो जले पर नमक डालने का काम हुआ अपने विचरों को मुझसे बाँटने का स्वागत

    shashibhushan1959 के द्वारा
    January 3, 2012

    आदरणीय संतोष जी एवं राज जी, सादर ! भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन मरा नहीं है, न मरेगा. बीज कभी नहीं मरता ! अनुकूल परिस्थिति आते ही उसमें से अंकुर निकलने लगते हैं. बड़े यग्य में, बड़े युद्ध में, बड़े आयोजन में ऐसी छोटी-छोटी बातें होती रहती हैं. हौसला बुलंद होना चाहिए, हिम्मत बनी रहनी चाहिए, आशा और विश्वास बना रहना चाहिए ! तूफ़ान भी कई चक्रों में आता है, रूक रूक कर…….! इस जनांदोलन का अभी तो एक चरण उठा है. ऐसे कई चरण उठाने होंगे ! ये एक गेम की तरह ही है. एक स्टेज पूरा हुआ ! दुसरे में कुछ विघ्न पड़ गया ! कोई बात नहीं ! युद्ध क्षेत्र में एक कदम आगे – एक कदम पीछे तो चलता ही रहता है. इससे क्या घबराना !


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