Reality and Mirage of Life

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RaJ


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इन पिंजरों को ,,,,,,,

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मंदिर को छोड़ आया पूजा किये बगैर
मस्जिद से चला आया इबादत किये बगैर
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पूँछ लिया सोने चाँदी अम्बार अन्दर लगे क्यों है
भूखे से बिलखते, हाड़ मांस के इन्सान बाहर खड़े क्यों हैं
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अन्दर मौलवी जन्नत के सपना दिखता क्यों है
मस्जिद बाहर ही हो गया आदमी का क़त्ल क्यों है
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तिलिस्म तुझ में है, पहना दे कपडे नंगे जिस्मों को
जादू नहीं, बस लगा दे थोडा मरहम इन जख्मों को
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इन पिंजरों को साँस के आने जाने के एहसास बहुत कम है
फिर भी तुझको इन साँसों के टूटने से होता बहुत गम है
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दे दे अभी, जो भी देना है इंसाफ के नाम पर
मुगालता ने देना , हिज्र में मिलेगा , के नाम पर
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मंदिर को छोड़ आया पूजा किये बगैर
मस्जिद से चला आया इबादत किये बगैर

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22 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

December 14, 2011

कड़वी हक़ीक़त को अल्फ़ाज़ों में बहुत सुंदरता से ढाला है आपने । बहुत बहुत बधाई…..आदरणीय राजीव जी । इन पिंजरों को साँस के आने जाने के एहसास बहुत कम है फिर भी तुझको इन साँसों के टूटने से होता बहुत गम है !! बहुत ही खूबसूरत !! :)

    RaJ के द्वारा
    December 14, 2011

    संदीप भाई आपका सन्देश स्पैम में जाता है पर मेरा विश्वास रहता है कि आपने जरुर कुछ लिखा होगा मैं उसे अप्प्रूव करके मंच पर लाकर आपका शुक्रिया अदा कर रहा हूँ

Santosh Kumar के द्वारा
December 13, 2011

आदरणीय राज जी ,..बहुत सुन्दर भावपूर्ण रचना ,..हार्दिक बधाई

    RaJ के द्वारा
    December 13, 2011

    santosh जी आपका स्वागत है धन्यवाद

Rajesh Dubey के द्वारा
December 13, 2011

भाई आपने मंदिर-मस्जिद के बाहर-भीतर का सजीव चित्रण किया है. धन्यवाद्.

    RaJ के द्वारा
    December 13, 2011

    rajesh ji Dhanyavad aage bhi aapka प्रोत्साहन मिलता रहे यही कामना है

sadhana thakur के द्वारा
December 13, 2011

सम्मानीय राज जी ,भावपूर्ण रचना ………….बधाई ………….

    RaJ के द्वारा
    December 13, 2011

    साधना जी बहुत बहुत शुक्रिया

alkargupta1 के द्वारा
December 12, 2011

अति सुन्दर रचना राज जी

    raj के द्वारा
    December 12, 2011

    अलका जी बहुत बहुत धन्यवाद

manoranjanthakur के द्वारा
December 12, 2011

बहुत ही सुंदर भाव लिए सन्देश देती रचना

    raj के द्वारा
    December 12, 2011

    रचना को पढने व प्रोत्साहित करने वाले शब्दों से नवाज़ने के लिए हार्दिक शुक्रिया मनोरंजन जी

Rajkamal Sharma के द्वारा
December 12, 2011

प्रिय राज जी ….. आदाब ! अन्दर पुजारी स्वर्ग के सपने दिखाता क्यों है मन्दिर भीतर-बाहर हो गया धर्म का खून क्यों है हरेक शेयर अपने आप में लाजवाब मन मोह लिया हाय जियरा लूट लिया रे ताली बजाकर बधाई नहीं नहीं मुबारकबाद हा हा हा हा हा हा हा :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :|

    raj के द्वारा
    December 12, 2011

    राजकमल जी आपका बात पहुचाने का तरीका बड़ा रोचक रहता है व हर हल में लाजबाब होता है बहुत शुक्रिया धन्यवाद

shashibhushan1959 के द्वारा
December 12, 2011

मान्यवर राज जी, सादर. दिखावा और फरेब की नीव पर प्रहार करती सुन्दर रचना. जो यथार्थ के बहुत नजदीक है.

    raj के द्वारा
    December 12, 2011

    शशि भूषण जी आपका मार्गदर्शन भविष्य में भी ऐसे ही मिलता रहे |

minujha के द्वारा
December 12, 2011

बहुत अच्छे भावों को व्यक्त करने का अलग तरीका बधाई हो

    raj के द्वारा
    December 12, 2011

    मीनू झा जी नमस्कार व सराहना पाकर ख़ुशी हुई

abodhbaalak के द्वारा
December 12, 2011

मंदिर को छोड़ आया पूजा किये बगैर मस्जिद से चला आया इबादत किये बगैर बहुत ही खूबसूरत रचना राज भाई, धर्म के मर्म को ……… http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

    raj के द्वारा
    December 12, 2011

    अबोध जी आपका भी धर्म के सही मायने समझती रचना भी मैंने पढ़ी और धर्म को ढकोसलों के सहारे जीती समाज को देख कर भाव उत्पन्न हुए धन्यवाद

nishamittal के द्वारा
December 12, 2011

बहुत सुन्दर रचना बधाई.

    raj के द्वारा
    December 12, 2011

    आपकी सराहना पाकर हमेशा की तरह अच्छा लगा , धन्यवाद


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